बुधवार, 26 जून 2013

partishtha ya ........................?

आग की ज्वाला शांत हो भी जाए तो 

यह मन की ज्वाला कैसे शांत हो ।

गैरों की गिला भूला भी दूं तो

अपनो की ये शिकवा कैसे ख़त्म हो ।



मेरा प्यार करना आपको नागवार गुजरा

आपने गैरों  के सामने खूब किया मेरा मुजरा ।

हमने प्यार में मर -मिटने की कसमे खायी

आपने हमें दुनिया से ही विदा करने की ठान ली ।


यह कैसी परतिष्ठा जो अपनों को रुसवा करे

यह कैसी आन जो अपनों की जान ले ।

यह कैसी कीमत जो परम्परा के नाम पर चुकानी पड़े

यह कैसी मर्यादा जो अपनों को दूर करके रखनी पड़े ।


अपनी परंपराओ से नयी पीढियो को गुलाम मत बनाओ

झूठे आन की खातिर अपनी शान मत बढ़ाओ ।

यह दौर परिवर्तन का  है इसे तो अपनाओ

अपनों की खातिर ही सही तूम अपना एक कदम आगे तो बढ़ाओ ।

                                                                                     रेशमा राय 'रश्मि '




                         

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